दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली एवं भारतीय दार्शनिक अनुसन्धान परिषद्, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में दो दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन किया गया। 17- 18 दिसम्बर को आयोजित इस संगोष्ठी का विषय ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और महाकवि कालिदास’ रखा गया था।संगोष्ठी के संयोजक संस्कृत विभाग के आचार्य प्रो.दया शंकर तिवारी थे।
संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए विश्वविद्यालय के डीन (महाविद्यालय) प्रोफेसर बलराम पाणि ने इस आयोजन को समय की माँग के अनुरूप बताते हुए कहा कि कालिदास भारतीय ज्ञान परम्परा के सशक्त संवाहक हैं। उद्घाटन समारोह के विशिष्ट-अतिथि और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के न्यास सदस्य पद्मश्री भरत गुप्त जी ने कालिदास के नाम पर दिल्ली में प्रमुख मार्ग का नामकरण करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रमेश कुमार पाण्डेय ने कालिदास के काव्य में भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति इत्यादि के उदाहरण देते हुए उन्हें भारतीयता का ध्वजवाहक बताया।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर वाचस्पति मिश्र ने कालिदास की वैज्ञानिक दृष्टि को आधुनिक जगत के सम्मुख लाने के लिए संगोष्ठी की उपयोगिता को रेखांकित किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रोफेसर रंजन कुमार त्रिपाठी ने कालिदास को विश्व के प्रसिद्ध कवियों के प्रेरणास्रोत बताते हुए उनके काव्य की मानवीय छवि को सामने लाने का आग्रह किया। उद्घाटन समारोह में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति प्रोफेसर ब्रजेश कुमार पाण्डेय, दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर भारतेंदु पाण्डेय, हिंदू अध्ययन केंद्र, दिल्ली विश्वविद्यालय के निदेशक प्रोफेसर ओमनाथ बिमली, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मानसिंह, पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय, रीवा परिसर के निदेशक प्रोफेसर तुलसीदास परौहा, विनोद बिहारी महतो विश्वविद्यालय धनबाद के पूर्व-कुलपति प्रोफेसर सुखदेव भोई जैसे संस्कृत जगत् के मूर्धन्य मनीषी उपस्थित रहे।
सम्मेलन के दौरान 11 विशिष्ट व्याख्यान सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें कालिदास एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पक्षों पर विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा सारगर्भित व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। इन विद्वानों में प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी, प्रोफेसर सदाशिव द्विवेदी, प्रोफेसर अभिराज राजेंद्र मिश्र, प्रोफेसर काशीनाथ न्यूपाने, आदि ने देश-विदेश के कवियों और काव्यों पर कालिदास के प्रभाव, उनके काव्य में निहित मानव-मूल्यों और उनकी प्रासंगिकता का विवेचन किया। सम्मेलन में आयोजित 26 समानांतर सत्रों में 200 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किए गए।
संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्य अतिथि दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर की निदेशिका प्रोफेसर रजनी अब्बी ने संगोष्ठी के आयोजन को दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से आज की पीढ़ी के विद्यार्थियों को भारत की सनातन संस्कृति और कालिदास की कृतियों के प्रति संवेदनशील होने का अवसर प्राप्त हुआ है। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर इंद्रनारायण सिंह ने इसे संस्कृत के माध्यम से संस्कृति के संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास बताया। अपने वक्तव्य में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रोफेसर अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कालिदास की सार्वभौमिक ख्याति को उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया। विभागाध्यक्ष प्रोफेसर भारतेन्दु पाण्डेय ने संगोष्ठी की उपलब्धियों को न केवल संस्कृत के विद्यार्थियों और शोधार्थियों बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा के सभी जिज्ञासुओं के लिए उपयोगी बताया।
संयोजक प्रोफेसर दयाशंकर तिवारी ने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह, डीन (महाविद्यालय) प्रोफेसर बलराम पाणि, विशिष्ट विद्वानों, प्रतिभागियों, विद्यार्थियों, सहसंयोजकों – डॉ. संजय कुमार, डॉ. राजमंगल यादव तथा डॉ. कामना विमल, सांस्कृतिक समिति के संयोजक डॉ. सौरभजी तथा विभागीय कर्मचारियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया। संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान एवं भारत माता की जयघोष के साथ हुआ।
