माघ पूर्णिमा आत्मशुद्धि और सामाजिक समरसता का संदेश

पवित्र माघ पूर्णिमा के शुभ अवसर पर परमार्थ निकेतन से देशवासियों, श्रद्धालुओं और कल्पवासियों को मंगलकामनाएँ व्यक्त की गईं। इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि माघ पूर्णिमा केवल बाह्य अनुष्ठानों का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि, संयम और अंतर्मन के जागरण का महापर्व है, जो व्यक्ति को सेवा, करुणा और परोपकार के मार्ग पर अग्रसर करता है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि माघ मास सनातन परंपरा में अत्यंत पावन माना गया है। इस अवधि में किए गए जप, तप, व्रत, दान और तीर्थस्नान का फल अनेक गुना बढ़ जाता है। माघ पूर्णिमा के दिन गंगा, यमुना और संगम में स्नान से मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है। यह तिथि भगवान विष्णु और चंद्रदेव की आराधना के लिए भी विशेष मानी जाती है। इस दिन दान, हवन, सत्संग, कथा-श्रवण और भजन-कीर्तन के माध्यम से ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश दिया गया।

उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में दान और स्नान के साथ ज्ञान का विशेष महत्व है। माघ पूर्णिमा हमें पवित्रता, सदाचार और धर्म के आदर्शों को जीवन में अपनाने तथा राष्ट्र और समाज के कल्याण के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देती है। इस दिव्य अवसर पर सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की गई।

माघ पूर्णिमा के साथ ही संत शिरोमणि गुरु रविदास की जयंती भी श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि गुरु रविदास जी का जीवन और वाणी समता, भक्ति, मानवता और सामाजिक न्याय के मूल्यों का सशक्त संदेश देते हैं। उन्होंने भक्ति आंदोलन को नई दिशा देते हुए ईश्वर-प्रेम को जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर रखा।

गुरु रविदास जी का प्रसिद्ध संदेश “मन चंगा तो कठौती में गंगा” आज भी समाज को यह सीख देता है कि सच्ची भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि निर्मल मन और शुद्ध आचरण में निहित है। एक कवि और संत के रूप में उन्होंने जन-जन के हृदय में भक्ति की ज्योति प्रज्वलित की, वहीं समाज सुधारक के रूप में छुआछूत, ऊँच-नीच और असमानता के विरुद्ध सशक्त स्वर उठाया।

इस पावन अवसर पर संत रविदास जी की साधना और राष्ट्र साधना को नमन करते हुए उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का आह्वान किया गया, ताकि प्रेम, समानता और सेवा के मूल्यों पर आधारित एक न्यायपूर्ण और समावेशी समाज का निर्माण हो सके।

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