भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 14 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित ए पी शिंदे ऑडिटोरियम में पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाणपत्र एवं नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया। कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। समारोह का उद्देश्य देशी पशु नस्लों के संरक्षण, पंजीकरण और उनके सतत विकास के लिए किए जा रहे राष्ट्रीय प्रयासों को सुदृढ़ करना था।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देशी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे पशु भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और किसानों की समृद्धि सीधे तौर पर इनके संरक्षण और विकास से जुड़ी है। उन्होंने जोर दिया कि भारत में पशुधन और मनुष्य का संबंध केवल आर्थिक या पोषण से नहीं, बल्कि गहराई से पारिस्थितिकी से जुड़ा हुआ है। इस संतुलन में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का सीधा प्रभाव पर्यावरण और धरती के भविष्य पर पड़ता है।
केंद्रीय मंत्री ने देशी नस्लों के संरक्षण में जुटे वैज्ञानिकों, संस्थानों और किसानों की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयास केवल पशुधन बचाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे जैव विविधता की रक्षा, ग्रामीण आजीविका को सशक्त करने और सतत कृषि के भविष्य को सुरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने 2019 में शुरू की गई देशी पशु नस्ल संरक्षण की राष्ट्रीय पहल को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इसका सीधा लाभ किसानों की आय, स्थिरता और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है।
उन्होंने इस अभियान को नीति और सम्मेलनों से आगे बढ़ाकर एक जन आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रयास गांवों, खेतों और किसान परिवारों तक पहुंचना चाहिए, ताकि व्यापक स्तर पर सहभागिता सुनिश्चित हो सके। साथ ही, उन्होंने नस्ल संरक्षण में योगदान देने वाले व्यक्तियों और संस्थानों को पहचान देने की आवश्यकता बताई, जिससे अन्य लोग भी प्रेरित हों। मीडिया से उन्होंने सकारात्मक प्रयासों को प्रमुखता से सामने लाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर परिषद के वरिष्ठ अधिकारी डॉ जाट ने कहा कि विकसित भारत का पशुधन दृष्टिकोण संरक्षण के साथ-साथ संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग पर आधारित है। उन्होंने बताया कि 2008 से अब तक 242 स्वदेशी पशु नस्लों का पंजीकरण किया जा चुका है और वर्ष 2047 तक सभी देशी नस्लों के शत प्रतिशत पंजीकरण का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने मवेशियों की घटती आबादी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नस्ल पंजीकरण केवल संरक्षण नहीं, बल्कि जैव संसाधनों पर संप्रभु अधिकार, किसानों के लिए लाभ साझा करने और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
डॉ राघवेंद्र भट्टा, उप महानिदेशक पशुविज्ञान, ने प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए पंजीकृत नस्लों की जानकारी दी और सतत पर्यावरण के लिए उनके संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला। समारोह के दौरान नई पहचानी गई पशु और पोल्ट्री नस्लों को पंजीकरण प्रमाणपत्र प्रदान किए गए तथा किसानों, प्रजनकों और संस्थानों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए नस्ल संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नस्ल संरक्षण पुरस्कार सूची
व्यक्तिगत श्रेणी
– जीतुल बुरागोहेन को लुइट भैंस संरक्षण के लिए प्रथम पुरस्कार
– कुडाला राम दास को पुंगनूर मवेशी संरक्षण के लिए द्वितीय पुरस्कार
– तिरुपति और रामचंद्रन काहनार को सांत्वना पुरस्कार
संस्थागत श्रेणी
– बिनझारपुरी मवेशी प्रमोटर्स एंड प्रोड्यूसर्स सोसाइटी को प्रथम पुरस्कार
– तमिलनाडु पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय को पुलिक्कुलम मवेशी संरक्षण के लिए द्वितीय पुरस्कार
– गाओलाओ मवेशी संरक्षण के लिए तृतीय पुरस्कार
– मेचेरी भेड़ संरक्षण के लिए तमिलनाडु पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय को सांत्वना पुरस्कार
समारोह ने यह स्पष्ट किया कि भारत का पशुधन क्षेत्र न केवल किसानों की आय बढ़ाने, बल्कि जैव विविधता संरक्षण और सतत कृषि विकास का एक मजबूत आधार है। यह आयोजन देशी पशु नस्लों के संरक्षण आधारित विकास को नई दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
